21 जून योग दिवस
योग एक शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास है जो भारत में उत्पन्न हुआ।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संयुक्त राष्ट्र
के संबोधन में 21 जून की तारीख का
सुझाव दिया, क्योंकि यह
उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का विचार पहली बार भारत के वर्तमान
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रस्तावित किया गया था।
योग
व्यक्ति के जीवन के लिए महत्वपूर्ण एवं लाभकारी है। इसे करने से हमारा मेटाबॉलिज्म
का संचार अच्छा रहता है। इसमें किसी भी प्रकार का हानि नहीं है।
इसे बड़े
बच्चे एवं बुरे भी कर सकते हैं इसलिए व्यक्ति को हर दिन योग करना चाहिए।
योग करने
के फ़ायदे :-
- मांसपेशियों की शक्ति और स्वर में वृद्धि
- श्वसन में सुधार, ऊर्जा और जीवन शक्ति
- संतुलित चयापचय बनाए रखना
- वज़न घटाना
- कार्डियो और संचार स्वास्थ्य
- एथलेटिक प्रदर्शन में सुधार
- चोट से सुरक्षा
- लचीलापन बढ़ा
Here
is what our honourable Prime Minister Modi Ji has said in the UN Assembly for
yoga.
Yoga is an invaluable gift of India's ancient tradition.
It embodies unity of mind and body; thought and action;
restraint and fulfillment; harmony between man and
nature; a holistic approach to health and well-being.
It is not about exercise but to discover the sense
of oneness with yourself, the world and the nature.
By changing our lifestyle and creating consciousness,
it can help in well being. Let us work towards adopting
an International Yoga Day.
— Narendra Modi, UN General Assembly
योग दिवस के दिन यह निम्नलिखित आसन जरूर करें ।
सूर्य नमस्कार
भूमिका : सूर्य पूरी पृथ्वी के लिए ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत है ।
सूर्य नमस्कार के बारह आसनों का लयबद्ध क्रम में अभ्यास करने से
शरीर और मन में एक परिर्वतनकारी शक्ति पैदा होती है ।
जिससे एक पूर्ण और अधिक गतिशील जीवन का निर्माण होता है ।
सूर्य नमस्कार के लिए सबसे अच्छा समय सूर्योदय का समय है ।
अवधि : सूर्य नमस्कार के बारह चरणों का अभ्यास दो बार पूरा होने पर
एक चक्र पूरा होता है । एक से बारह चरण तक आधा चक्र माना जाता है ।
अभ्यास आरंभ करने वाले को दो चक्रों से शुरू करना चाहिए सप्ताहों के
बाद एक - एक चक्र बढ़ाते जाना चाहिए । जिससे थकान न हो ।
सावधानियाँ
1. सूर्य नमस्कार के आसनों को किसी योग शिक्षक अथवा बड़ों की निगरानी
में ही करना चाहिए ।
2. ज्वर , अधिक सूजन , फोड़ा अथवा लाल चकत्ते हो जाने पर सूर्य
नमस्कार का अभ्यास तुरंत बंद कर देना चाहिए ।
3. सूर्य नमस्कार उन लोगों को नहीं करना चाहिए जिन्हें उच्च रक्तचाप या
हृद् - धमनी जन्य रोग हों । क्योंकि कमजोर हृदय या रुधिर वाहिका या
आंत्र यक्ष्मा के रोगियों के लिए भी यह अभ्यास सही नहीं है । पीठ की
समस्या वालों को ये अभ्यास करने से पहले डॉक्टर से परामर्श ले लेना
चाहिए । साधारण लाभ
4. बढ़ते बच्चों के विकास क्रम को संतुलित करता है ।
5. इससे मस्तिष्क को ताजा , ऑक्सीजन युक्त रुधिर प्राप्त होता है|
6. सजगता और एकाग्रता में वृद्धि होती है ।
शरीर स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है । .
प्रथम चरण : सावधान की मुद्रा में सूर्य की ओर मुँह करके खड़े हो जाएँ ।
आँखें बंद कर लें । पंजों को एकसाथ कर लें । कोहनियाँ मोड़ते हुए हाथों को
सामने लाकर नमस्कार की मुद्रा मे जोड़ लें । मानसिक रूप से सूर्य को
नमन करें । पूरे शरीर को शिथिल करें ।
श्वसन: सामान्य रखें|
सजगता :पेट और गले के बीच रखें ।
लाभ : यह स्थिति अन्य अभ्यासों के लिए शांत और एकाग्र मानसिक
अवस्था लाती है ।
दूसरा चरण : दोनों हाथों को ऊपर उठाएँ । उनमें खिचाव पैदा करते हुए
पीछे की ओर ले जाएँ । दोनों हाथों के बीच कंधों की चौड़ाई के बराबर दूरी
रखें । सिर तथा भुजाओं और धड़ के ऊपरी भाग को थोड़ा सा पीछे झुकाएँ ।
श्वसन : हाथों को उठाते समय साँस लें ।
सजगता : पेट के खिंचाव और फेफड़ों के विस्तार पर ।
लाभ : यह आसन पाचन में सुधार लाता है । मेरुदंड की तंत्रिकाओं को
शक्ति देता है । फेफड़ों को फैलाता है तथा बढ़े वनज कम करता है ।
तीसरा चरण : सामने की ओर झुकें और तब तक झुकते रहें जब तक कि
उँगलियाँ अथवा हथेलियाँ पंजों के पास जमीन को स्पर्श न करने लगे ।
मस्तक को घुटनों से स्पर्श न करने लगे । मस्तक को घुटनों से सीधा रखें ।
श्वसन : सामने की ओर झुकते समय श्वास छोड़ें ।
सजगता: कमर पर
लाभ : यह पेट एवं आमाशय के रोगों में लाभकारी है । इससे मेरुदंड में
लचीलापन आता है । पाचन में सुधार होता है कब्ज दूर होती है ।
सावधानी : जिन्हें पीठ दर्द की समस्या हो वे पूरा न झुकें उतना ही झुकें
जितना आराम से झुक सकें ।
चौथा चरण : हथेलियों को पंजों के बगल में जमीन पर सीधा रखे तथा
दाहिने पैर को जितना हो सके पीछे की ओर ले जाएँ । बाएँ पंजे को
जमीन पर टिकाकर रखें और घुटने को मोड़ें । भुजाओं को सीधा रखें ।
आखिर में शरीर का भार दोनों हाथों , बाएँ पैर , दाहिने घुटने और दाहिने
पैर की उँगलियों पर होना चाहिए । अब सिर को पीछे की ओर झुकाकर पीठ
को धनुषाकार बनाएँ । आंतरिक दृष्टि को भ्रूमध्य पर केंद्रित रखें ।
श्वसन : दाहिने पैर को पीछे ले जाते समय श्वास लें ।
सजगता : जाँघ से छाती तक के खिंचाव पर तथा भवों के मध्य
लाभ : इससे आमाशय की क्षमता बढ़ती है । पैरों की पेशियाँ सुदृढ़ बनती है।
तथा तंत्रिका तंत्र संतुलित होता है ।
पाँचवा चरण : बाएँ पंजे को पीछे ले जाकर दाहिने पंजे के बगल में रखें
और नितंबों को उठाएँ व सिर को भुजाओं के बीच ले आएँ । जिससे पीठ
और पैर एक त्रिभुज की दो भुजाओं के समान लगे । आखिर में भुजाएँ
सीधी रहें । एड़ियों को जमीन पर तथा सिर को घुटनों की तरफ लाने का
प्रयास करें परंतु अधिक जोर न लगाएँ ।
श्वसन : बाएँ पैर को पीछे ले जाते समय श्वास छोड़ें
सजगता : गले के आस - पास
लाभ : यह आसन पैरों और भुजाओं की पेशियों को शक्ति प्रदान करता है ।
मेरुदंड को भी पुष्ट करता है । मेरुदंड के ऊपरी भाग में रक्त संचार बढ़ाता है।
छटा चरण : घुटनों , वक्ष और ठुड्डी को नीचे लाकर जमीन का स्पर्श कराएँ|
अंतिम स्थिति में केवल पैरों की उँगलियाँ घुटने , वक्ष , हाथ और ठुड्डी
जमीन का स्पर्श करेंगे । पेट का हिस्सा जमीन से थोड़ा ऊपर उठा रहे ।
श्वसन : इस में श्वास को बाहर ही रोके रखें । श्वसन न करें ।
सजगता : पेट पर
लाभ : यह आसन पैरों और भुजाओं की पेशियों को मजबूत बनाता है ।
सातवां चरण : नितंबों और श्रोणि प्रदेश को नीचे लाकर जमीन का स्पर्श
कराएँ । कोहनियों को सीधा करते हुए पीठ को धनुषाकार बनाएँ । वक्ष को
सर्प की मुद्रा में आगे की ओर ले आएँ । सिर को पीछे की ओर झुकाकर
दृष्टि भंवों के मध्य स्थित करें । दोनों हाथों के सहारे धड़ को ऊपर उठाए
रखें ।
श्वसन : धड़ को उठाते समय और पीठ को धनुषाकार बनाते समय साँस लें ।
सजगता : मेरुदंड के शिथिलीकरण पर
लाभ : यह आसन यकृत , गुर्दे तथा एड्रीनल ग्रंथियों के लिए लाभदायक है ।
कब्ज दूर करके पाचन क्रिया को सुधारता है । यह पीठ के रक्त संचार को
सुधारता है तथा मेरुदंड को लचीला बनाता है ।
आठवाँ चरण : नितंबों को ऊपर उठाएँ और एड़ियों को जमीन पर ले आएँ ।
सिर को भुजाओं के बीच ले आएँ । जिससे पीठ और पैर एक त्रिभुज की दो
भुजाओं के समान दिखाई दें ।
श्वसन : नितंबों को उठाते समय श्वास छोड़ें ।
सजगता : कमर के शिथिलीकरण पर अथवा गले पर ।
लाभ : मेरुदंड को लचीला बनाता है । गुर्दे व यकृत को शक्ति देता है ।
नौंवा चरण :हथेलियों को जमीन पर सपाट रखे । बाएं पैर को मोड़ें और बाएं
पंजें को आगे लाकर दोनों हाथों के बीच रखें । दाएँ घुटने को नीचे लाकर
जमीन का स्पर्श करवाएँ श्रोणि को आगे की ओर बढ़ाएँ सिर को पीछे की
ओर झुकाएँ । पीठ को धनुषाकार बनाए और दृष्टि को भंवों के मध्य केंद्रित
करें ।
श्वसन : इस आसन में आते समय श्वास लें ।
सजगता : भंवों के मध्य
लाभ : यह आसन आमाशय की कार्य क्षमता बढ़ाता है । पैरों की पेशियों को
मज़बूत बनाता है । तंत्रिका तंत्र को संतुलित करता है ।
दसवाँ चरण : इस चरण में तीसरे चरण की पुनरावृति है । दाएँ पंजे को
आगे बाएँ पंजे की बगल में लाएँ । दोनों घुटनों को सीधा करें । ललाट को
घुटनों से स्पर्श कराने का प्रयास करें पर अधिक जोर न लगाएँ ।
श्वसन : आसन में आते समय श्वास लें ।
सजगता : श्रोणि प्रदेश पर ।
लाभ : यह आसन पेट के रोगों के उन्मूलन में उपयोगी है । इससे मेरुदंड
की तंत्रिकाओं को भी शक्ति प्राप्त होती है ।
ग्यारहवाँ चरण : यह आसन दूसरे चरण की पुनरावृत्ति है । धड़ को ऊपर
उठाएँ और भुजाओं को सिर के ऊपर तानें । भुजाओं के बीच कंधों की चौड़ाई
के बराबर दूरी रखें । सिर , भुजाओं और धड़ के ऊपरी भाग को थोड़ा पीछे
की ओर झुकाएँ ।
श्वसन : शरीर को सीधा खिचाव करते समय साँस लें ।
सजगता : उदर के खिंचाव और फेफड़ों के विस्तार पर ।
लाभ : पेट के सभी अंगों में खिंचाव पैदा करता है और पाचन में सुधार लाता
है । यह बढ़े हुए वजन को कम करने में भी सहायक है ।
बारहवाँ चरण : यह अंतिम चरण है और प्रथम चरण के समान है ।
दोनों हाथों को जोड़कर वक्ष के सामने ले आएँ
श्वसन : अंतिम स्थिति में आते समय श्वास छोड़ें ।
सजगता : हृदय प्रदेश पर
लाभ : शांत और एकाग्र मानसिक अवस्था की प्राप्ति ।










nice poems...interesting
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